स्वप्न के ये खिलौने
मुझे दे दिये स्वप्न के ये खिलौने कहाँ तक सम्हालूँ, कहाँ पर सजाऊँ ! मुझे चाँदनी रात भाती नहीं है, चमक तारकों की सुहाती नहीं है, मुझे चाहिये स्नेह के दीप अनुपम जिन्हें मैं जला कर जगत जगमगाऊँ ! यह बादल की रिमझिम मुझे छेड़ जाती, यह बिजली दशा पर मेरी...
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Sadhana Vaid
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[12 Apr 2010 22:31 PM]



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