बेमतलब के खर्च....

मौन में बात.. देर रात,इन दिनों की क्या कहें? यूं पड़े-पड़े गुज़र रहे हैं मानों बेमतलब के खर्चे। शाम के वक़्त कुछ चिल्लर बची रह जाती है जिन्हें घर में चारों तरफ बिखेर देता हूँ। फिर देर रात तक उनसे लुका-छिपी का खेल खेलता हूँ। जब तक अंतिम सिक्के पर पहुंचता हूँ नींद आ... [पूरी पोस्ट]
writer मानव

अपने से..

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[12 Apr 2010 15:58 PM]

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