रुस्तम सौ, सोहराब हज़ारों रखती है.

हिन्द-युग्म आँखों में असबाब हज़ारों रखती है, वो लड़की जो ख्वाब हज़ारों रखती है.... रोती है, जब चाँद सिकुड़ता थोड़ा भी,पर खुद हीं आफ़ताब हज़ारों रखती है.... क्या जाने, क्यों होठों पे सौ रंग भरे, जब उन में गुलाब हज़ारों रखती है..मैं क्या हूँ! गर्वीली अपने कदमों... [पूरी पोस्ट]
writer विश्व दीपक

vishwa deepak tanha

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[12 Apr 2010 13:35 PM]

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