शब्द और अर्थ

शब्द और अर्थ कभी तिरे हाथ की लकीरों से गुजरा था , आईने को भी यकीं नहीं मेरा चेहरा था . अब शब की सयाही मेरा हमसफ़र सही , कभी मेरा सूरज उठा था सुनहरा था . अखबार हाथ में प्याली सा कांपे है , हादिसा बड़ा न हो पर डरा - डरा था . सुनहरी शाम ने खिंची एक परछाई , वो दो बदन थे... [पूरी पोस्ट]
writer अतुल प्रकाश त्रिवेदी/ અતુલ પ્રકાશ ત્રિવેદી / অতুল
views
10
upvote
0
downvote
0
rating
0
comments
1
[12 Apr 2010 12:06 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix