खड़ी दोपहरी में देखा था उसको छत पर......
खड़ी दोपहरी में देखा था उसको छत पर...... अम्बार दुःख का झूल रहा थाआँखों में उसके.....एक हाथ में पानी का कटोरा दूसरे में उल्झी-अधूरी लकीरें तन काला कि जैसे सारी धूप सोख ली हो उसने.....हाथ-पैर समशान की लकड़ी की तरह जल रहे...
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Tej Pratap Singh
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[12 Apr 2010 11:20 AM]



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