कितनी आग भरी तेरी प्यास में
कितनी आग भरी तेरी प्यास मेंइतनी गहरी घटाएँ चारों ओर हैमीठे बोल रहे दादुर मोर हैचातक बोल मोती कितने बंद तेरे विश्वास में ||किस्मत को अंधियारे ने क्या खूब छलामेहनत से निष्ठा से मेरा दीप जलाउसकी लौ पे जलता रे पतंगे तू किसकी आश में ||पीड़ा कितनी मन के झूले...
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क्षत्रिय
स्व.श्री तन सिंह जी कलम से
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[12 Apr 2010 10:59 AM]



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