राहत इन्दौरी साहब की नई ग़ज़ल
राहत इन्दौरी किसी तआरुफ़ के मोहताज़ नहीं हैं। उनकी एक ताज़ा ग़ज़ल, उनकी इजाज़त के साथ शाया कर रहा हूँ। छोटी बहर की बेहद खूबसूरत ग़ज़ल है । लीजिए मुलाहिज़ा कीजिए-ग़ज़लतू शब्दों का दास रे जोगीतेरा कहाँ विशवास रे जोगीइक दिन विष का प्याला पी जाफिर न लगेगी प्यास रे...
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सतपाल ख़याल
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[12 Apr 2010 05:21 AM]



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