उठी लोक मानस में आंधी निहारो : स्व. रामगोपाल दीक्षित
उठी लोकमानस में आंधी निहारो,
तुम्हें जो गगन से धरा पर उतारे.
क्षितिज लाल होता चला जा रहा है,
तुम्हें ये प्रकृति की छटा जंच रही है,
दबी दीन आहों की ज्वाला धधक कर,
रुधिर क्रान्ति की नव दिशा रच रही है,
अभी पात पीले ही केवल झड़े हैं,
कभी आगे चल कर न जड़ से...
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[12 Apr 2010 03:03 AM]



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