नि:शब्द
नि:शब्द![अजित वडनेरकर जी की अ-कविता रूपी कविताओं से किंक्रतव्यविमूढ़ होकर............]प्रयोग करके शब्दों के ब्रह्मास्त्र चल दिये,अर्थो का क़र्ज़ लाद के अब चल रहे है हम.शब्दों के कारोबार में कंगाल हो गए,अर्थो को बेच-बेच के अब पल रहे...
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Mansoor Ali
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[12 Apr 2010 02:25 AM]



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