सुनना, करना और समझना
सत्य की अनुभूति होती है । किसी ज्ञानी जन से इसके संबंध में सुनने मात्र से प्राण परितृप्त नहीं होते । इसके संबंध में शास्त्र पढ़ लेने पर भी सत्य की प्यास नहीं बुझती । इस सत्य की प्यास तब तक नहीं मिटती जब तक कि यथार्थ में उसकी अनुभूति नहीं होती । सुनने और...
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Manoj Bharti
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[11 Apr 2010 07:52 AM]



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