बदन

अंतर्द्वंद का आइना जोश है इस जिस्म में, जज्बात से सिहरता बदनजंग से हालात हैं, हर रात है पिघलता बदन.आरज़ू-ए-वस्ल वो, खूंखार आज बाकी नहीं साथ हो इक हमसफ़र, तन्हा पड़ा तरसता बदन.कायदा संसार का, इंसान पे लिपटता कफ़न,फ़र्ज़ की आदायगी, है दर-बदर भटकता बदन. जिंदगी में ज़ख्म... [पूरी पोस्ट]
writer knkayastha

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[11 Apr 2010 03:33 AM]

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