प्रपंच
प्रपंच दर्द की दीवार हैं, सुधियों के रौशनदान. वेदना के द्वार पर, सिसकी के बंदनवार. स्मृतियों के स्वस्तिक रचे हैं. अश्रु के गणेश. आज मेरे गेह आना, इक प्रसंग है विशेष.द्वेष के मलिन टाट पर, दंभ की पंगत सजेगी.अहम् के हवन कुन्ड में,आशा की आहुति जलेगी.दूर बैठ...
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रचना दीक्षित
कविता
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[11 Apr 2010 02:19 AM]



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