आज शहर से उनके फिर एक मुसाफिर आया
सोये हुए जज्बात को, किस्मत ने यूँ जगाया आज शहर से उनके फिर, एक मुसाफिर आया उसके कपड़ो पर लगी धुल भी, उस शहर का हिस्सा थी
जिस ओर जाने को हमने, हर नुस्खा आजमाया कितनी खुशनसीब है ये आखे, जो देखती है हर रोज़ उन्हें
तडपे इसकदर हम की अब इस बुत से, डरता है खुद...
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Anurag Geete
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[11 Apr 2010 01:26 AM]



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