रेणु की दुनिया- जिसके बिना हम अधूरे हैं..

अनुभव '' कई बार चाहा कि, त्रिलोचन से पूछूँ- आप कभी पूर्णिया जिला की ओर किसी भी हैसियत से, किसी कबिराहा-मठ पर गये हैं? किन्तु पूछकर इस भरम को दूर नहीं करना चाहता हूं। इसलिए, जब त्रिलोचन से मिलता हूं, हाथ जोड़कर, मन ही मन कहता हूं- "सा-हे-ब ! बं-द-गी !!"-... [पूरी पोस्ट]
writer गिरीन्द्र नाथ झा
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[10 Apr 2010 22:53 PM]

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