इस एकदम ज़रा देर के लिए में जितना जीवन होगा..
एकदम ज़रा देर के लिए होगा, बस ज़रा ज़रा देर के लिए कि जिजीविषा भरी वह आवाज़ धौंकती आएगी, बगल से गुज़र जाएगी, इक सिसकारी छाती पर भारी, लिपटे लपेटे जैसे आग और धुएं के धुंध में दगे गुज़रते थे वो गुज़रे ज़मानों के इंजन, धक् कलेजा मुंह को आता था और माथे के...
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Pramod Singh
मन की गांठ
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[10 Apr 2010 19:09 PM]



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