बेतार की जिरह
कुछ सोच हैं, हैरान हूँ, परेशां हूँ बा वजह, खुद के नाम हम कहूं, या यूं कहूं कि मैं.क्या यूं कहूँ, ज़र्रा हूँ फू, सहरा में गुम गया,एक जड़ हूँ बगीचे में, या गुंचों में है जगह. किन खुशबुओं में ख़ाक हूँ, किस रंग में फ़ना,मैं हूँ यहाँ, या चुक गया, दफ़ना...
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जोशिम
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[10 Apr 2010 18:00 PM]



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