स्निग्धा तु मेरी सासों में घोल रहीं थी अमिय
स्निग्धातु मेरी सासों में घोल रहीं थी अमियतब से अब तकसिर्फ़ मैंसीख पाया हूंप्यार की बातैंओ चिर छायातुम्हारा आभास लेकर ज़िंदा हूंवरना कब का धुएं के गुबार के साथ जो चिता पर उभरती लौ से भागती नज़र आती हैंअनज़ान दिशा में गुम हो जातालोग तब मेरी पराजित देह पर शोक...
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गिरीश बिल्लोरे
मां
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[10 Apr 2010 16:58 PM]



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