थोडा बहुत ही सही लखनऊ बाकी है...
खानाबदोश पाते थे मंजिल कभी यहाँ सजती थी शबोरोज़ महफ़िल कभी यहाँ मुल्क के फलक पे कभी आफताब था तहज़ीब का शहर ये कभी लाजवाब थाउस सुनहरे दौर की खुशबू बाकी है थोडा बहुत ही सही लखनऊ बाकी है सीखते थे बोलना, अहले जहां यहाँ मिलते आज भी बहुत शीरीं ज़ुबां यहाँ माना...
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हिमांशु बाजपेयी
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[10 Apr 2010 13:25 PM]



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