थोडा बहुत ही सही लखनऊ बाकी है...

अमाँ यार..... खानाबदोश पाते थे मंजिल कभी यहाँ सजती थी शबोरोज़ महफ़िल कभी यहाँ मुल्क के फलक पे कभी आफताब था तहज़ीब का शहर ये कभी लाजवाब थाउस सुनहरे दौर की खुशबू बाकी है थोडा बहुत ही सही लखनऊ बाकी है सीखते थे बोलना, अहले जहां यहाँ मिलते आज भी बहुत शीरीं ज़ुबां यहाँ माना... [पूरी पोस्ट]
writer हिमांशु बाजपेयी
views
19
upvote
2
downvote
0
rating
2
comments
4
[10 Apr 2010 13:25 PM]

Free Vedic Astrology From Astrobix