ग़ज़ल : मुहब्बत आशना हो कर.......
मुहब्बत आशना हो कर वफ़ा ना-आशना होना इसी को तो नहीं कहते कहीं काफ़िर-अदा होना ? ये तपती दोपहर में मुझसे साए का जुदा होना ज़ियादा इस से क्या होगा भला बे-आसरा होना ? यकीं आ ही गया हमको तुम्हारी बे-नियाज़ी से बुज़र्गो से सुना था यूँ तो बन्दों का खु़दा होना ! न...
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आनन्द पाठक
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[10 Apr 2010 08:30 AM]



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