ग़ालिब की शोख़ी
पकड़े जाते हैं फ़रिश्तों के लिखे पर नाहक़,आदमी कोई हमारा दमे-तहरीर भी था ।अर्थात "फ़रिश्तों के लिखने पर हम नाहक पकड़े जाते हैं । उनके रिपोर्ट लिखते वक़्त कोई हमारा भी आदमी उपस्थित था ? बेहवाही की तहरीर पर पकड़ना भी कोई न्याय है । "ग़ालिब गर इस सफ़र में...
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अनिल कान्त :
mirza ghalib
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[10 Apr 2010 07:07 AM]



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