अनपढ़ औरत

कवि मन मेरा अनपढ़ औरत जानता हूँ एक औरत को जो अनपढ़ है इस एक अवगुण को छोड़कर सर्व गुण संपन है सादगी और सुन्दरता की मूरत है छलकता हुआ प्रेम कमसीन सी सूरत है करती है सबकी सेवा सबको है अपना मानापर जरा सी चूक परदेते हैं सभी... [पूरी पोस्ट]
writer devendra goswami
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[10 Apr 2010 06:21 AM]

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