टेसू के फूल

तृषा'कान्त' टेसू के फूलखिल आये है फ़िर बबूल के जंगल मे स्नेह की बरसात न सही…. मुक्‍त ….. सर्द रिश्तों की जकड़न से बेखबर ... बौराये आम, पीले पत्‍तों बीच वासन्ती बयार से मुसकराने लगे हैं खिलखिलाने लगे हैं स्नेह सुगंध के बिना ही सही ...... आतंक की गर्मी, अभी आगे भी... [पूरी पोस्ट]
writer श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’

कविता

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[10 Apr 2010 02:36 AM]

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