बातें वो अनकही सी

कुछ पन्ने मेरी दराज़ से.... बहुत बार कही, मगर कई बातें बेजुबां सी लबो तक आने को लफ्ज़ ढूंढती रही . बिलखते से जज्बात की तरहजहन में कौंधती रहीं.तुमने देखा नहीं शायद,मेरी पलकों के साहिल पेउन्हें खामोश बैठे हुए.छूकर जो गुजरी यादो की बदली,आँखों को समंदर करती रही.बातें वो अनकही सी तड़पती... [पूरी पोस्ट]
writer ●๋• नीर ஐ

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[10 Apr 2010 01:24 AM]

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