इतने निकट न आएँ कि आप के साँसों की दुर्गन्ध सताने लगे

एक आलसी का चिठ्ठा कल मेरे एक अति प्रिय शिल्पी ब्लॉगर घोषित रूप से ब्लॉगरी छोड़ गए। इससे पहले एक ब्लॉगर जिन्हें मैं अन्ना कहता था, चुपचाप ब्लॉगरी छोड़ गए। कल रात खिन्न होकर मैंने भी एक कविता रच मारी। आज के दो तीन और लेख भी कहीं न कहीं इस समस्या से साक्षात्कार करते दिखते... [पूरी पोस्ट]
writer गिरिजेश राव
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[10 Apr 2010 00:07 AM]

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