ख़बरों में आज का यह दौर है कि.........ज़रा रूको भी.......मुंह उस तरफ़ फेर लेने दो.........सतीश पंचम
'ख़बरनवीसी' का है ये आलम, शहीदों के घर था मातम रो रही थी संगिनी, रो रहे थे बच्चे मईया बिलख रही थी, गईया भी चुप खडी थी थी देहरी भी सूनी-सूनी, रस्ते भी चुप पडे थे और ख़बरें चल रही थीं बहुत तेज़ चल रही थीं कुछ दौड़ रही थीं कुछ हाँफ रही थी सेहरा कब बँधेगा,...
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सतीश पंचम
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[09 Apr 2010 23:36 PM]



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