निवाला
सुबह होने के साथ हीअट्टहास करताछा जाता है राक्षसी दिन।जैसे भूखा हो बरसों से।अपने नुकीले दांतों के बीच रख कर चबाता हैऔर एक एक करकेखाने लगता है हम सबको।अपने लवणयुक्त चिपचिपेलार के साथ उतारता हैअन्धेरी गर्म कोठरी से पेट में।फिर आंतों के अजगरी कसाव सेदबाता...
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अमिताभ श्रीवास्तव
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[09 Apr 2010 15:31 PM]



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