नवगीत: करो बुवाई... --संजीव 'सलिल'
नवगीत:करो बुवाई...खेत गोड़कर करो बुवाई...*ऊसर-बंजर जमीन कड़ी है.मँहगाई जी-जाल बड़ी है. सच मुश्किल की आई घड़ी है.नहीं पीर की कोई जडी है.अब कोशिश कीहो पहुनाई.खेत गोड़कर करो बुवाई...*उगा खरपतवार कंटीला. महका महुआ मदिर नशीला.हुआ भोथरा कोशिश-कीला.श्रम से कर...
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आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
khet
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[09 Apr 2010 14:33 PM]



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