के.सी.वर्मा
गुस्ताखियाँ ...!!!कमलेश वर्मा मन तडपता है देख कर, उसकी नादानियाँ ,न समझ 'दिल की' करती है मनमानियां । पहले जैसा अब कुछ भी नहीं ऐसा ,अब तो बस होती हैं ,हैरानियाँ । जहाँ मचलती थी बहारें चमन में ,आज बस !बसती हैं उधर वीरानियाँ । ऐसी फितरत नही थी, उसकी कभी ,ये...
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कमलेश वर्मा
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[09 Apr 2010 13:18 PM]



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