ताजमहल
वाह साहब वाह !! बहुत मेहनत की है किसीने..एक हैरतंगेज करिश्मे को धार्मिक रंग देने की..भाई ! हम तो अपनी नादानी में अब तक ये ही समझते थे की..इमारतें नहीं इंसान धार्मिक होता है..और संप्रदाय..वो तो बस खेल हैं सियासी लोगों के..लीजिये पेश-ए-नज़र है ख़ास आपके लिए...
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manish badkas
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[09 Apr 2010 11:54 AM]



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