पगला मानुष
कभी तन्हाई मे बैठ के सोचो.. क्या हम पगले नहीं हैं.. कभी कुछ तो कभी कुछ करते हैं... कोई निश्चितता तो है ही नहीं जीवन मे.. तो हम भी तो एक पगले मानुष ही हैं...मै तो एक पगला मानुष,न जाने किस पल क्या कर जाऊं. किस पल मे मै हंस बैठूं,न जाने किस...
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हिमांशु पन्त
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[09 Apr 2010 10:01 AM]



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