खामोश अदालत अभी जारी है

Kuchh kahi kuchh unkahi आज की रात बहुत ही भारी है, मेरी गर्दन है और उनकी आरी है।बोया था फूलों का बीज हमने , जो उगी है वो कैक्टस की झारी है।गरीबी, भूख ,हिंसा बढ़ रही, देश की कागज़ी प्रगति फिर भी जारी है।डब्बे में बंद लोग बढ़ते जा रहे हैं, ढलान पर इस देश की गाडी है।हर जगह... [पूरी पोस्ट]
writer Nihar Khan
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[09 Apr 2010 04:47 AM]

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