घर और महानगर

aradhana-आराधना का ब्लॉग घर (१.) शाम ढलते ही पंछी लौटते हैं अपने नीड़ लोग अपने घरों को, बसों और ट्रेनों में बढ़ जाती है भीड़ पर वो क्या करें ? जिनके घर हर साल ही बसते-उजड़ते हैं, यमुना की बाढ़ के साथ. (२.) चाह है एक छोटे से घर की जिसकी दीवारें बहुत ऊँची न हो, ताकि हवाएँ... [पूरी पोस्ट]
writer aradhana

कवितालघु कविताआकाशpoetry/कविता

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[03 Apr 2010 20:59 PM]

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