एक आग रगों में सुलगती है ,अक्षरों में ढलती है
न जाने कितनी खामोशियाँ आपसे आवाज़ मांगती है न जाने कितने गुमनाम चेहरे आपसे पहचान मांगते हैं और एक आग आपकी रगों में सुलगती है ,अक्षरों में ढलती हैअमृता के लिखे यह लफ्ज़ वाकई उनके लिखे को सच कर देते हैं ...उनके अनुसार काया के किनारे टूटने लगते हैं सीमा में...
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रंजना [रंजू भाटिया]
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[09 Apr 2010 01:08 AM]



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