कुछ यादें तुम्हारा रास्ता पूछ रहीं हैं
गिरह में लिपटी हैं कुछ रात तुम्हारी,कुछ कागज़ के पन्नों पे बिखरी हैं.कुछ बारिश में भीग रहीं हैं, कुछ मिटने का बहाना ढूंढ रहीं हैं.आजाओ किसी रोज़ एक बार फिर तुम भी,कुछ यादें तुम्हारा रास्ता पूछ रहीं हैं.सूखे लबों से कंप-कंपाती याद तुम्हारी,मयखाने से भी आज...
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●๋• नीर ஐ
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[09 Apr 2010 00:09 AM]



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