कितना कठिन है यारो
इक दीप को जलाना कितना कठिन है यारोरो करके मुस्कुराना कितना कठिन है यारोजीवन मेरा सँवरता मुश्किल से खेलकर हीखुद को सदा सजाना कितना कठिन है यारोकितनों को गिरा करके महलों का सफर होतागिरने से नित बचाना कितना कठिन है यारोचाहा था दिल से जिसको गर दूर चला जाए...
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श्यामल सुमन
कविता
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[08 Apr 2010 22:51 PM]



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