बच्ची और मैं और धू-धू जलता दिन..
बच्ची फिर आकर अपने पोज़ीशन पर खड़ी हो गई है और आंखें फाड़े मुझे घूर रही है! अरे, इसे कोई रोकेगा नहीं? शरीफ़ों के मुहल्ले में ये क्या तमाशा है! (ठीक है कि मुहल्ले में मैं भी रहता हूं, मगर मुहल्ला शरीफ़ ही है. बच्ची के घरवाले तक शरीफ़ लोग हैं. बच्ची...
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Pramod Singh
पतनशील साहित्य
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[08 Apr 2010 13:35 PM]



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