सोने सी सच्ची वो मुझको रोज मनाती मेरी माँ
चैन से सारी रात मैं सोता, जागी रहती मेरी मां नींद उमचता जब भी मैं तो थपकी देती मेरी मांआंगन में किलकारी भर भर ता ता थैया दौड़ा थाजब भी गिरने लगता था मैं पीछे रहती मेरी मांपट्टी पुस्तक, बस्ता देकर छोड़ तो आई थी मुझको शाला में रोता था मैं...
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प्रकाश पाखी
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[08 Apr 2010 12:56 PM]



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