"पंथी"
अँधेरे राह ढूँढ़ते हैं, रात गहराई है इतनी,धड़कने तक गूंजती हैं,खामोशियाँ छाई है कितनी,चांदनी में तर हवाएं, लोरिओं का राग दें, बिस्तरे के नर्म तकिये,बांहें फैला आवाज़ दें,पलकें हुयी जाती हो बोझिल, जिस्म चाहे टूटता है, हौसलों में मस्त ये मन, उठ...
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Yogesh Sharma
"पंथी"
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[08 Apr 2010 12:21 PM]



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