मनीष की कलम से आपकी खिदमत मे.......

ये सच है १.कसम खुदा की शायरी का मिजाज़ हीं कुछ और होता यक़ीनन शायरों की तादाद भी कुछ और होता ,हर हुस्न दीदार करती शायरों की शायरी सेकाश के कमबख्त ये आइना ना होता ।२.कौन कमबख्त हदे आशिकी को बर्दाश्त कर पाया है किसी ने शराब को तो किसी ने मौत को गले लगाया है ।३.हो... [पूरी पोस्ट]
writer मनीष झा
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[08 Apr 2010 10:21 AM]

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