शायरी नहीं आती..

युग क्रांति ये ठीक है की हमें शायरी कर नहीं आती,बातें हो जाती हैं पे बात कर नहीं आती..!!यूँ ही निकल पड़ते हैं कुछ लफ्ज़ बेसाख्ता,मौज है उनकी और मौज कर नहीं आती..!!मक्ता वजनी नहीं और काफ़िया है तंग,तंगदिली की पतंग कर नहीं आती..!!अश्यार हैं बुझे-बुझे और ग़ज़ल है... [पूरी पोस्ट]
writer manish badkas
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[08 Apr 2010 08:16 AM]

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