शेर जो गजल न बन सके - जिन्दगी

दिल का दर्पण -  परावर्तन कुछ दूर यूंही चल कर अक्सर ठहर जाती है जिन्दगी फ़िर हर इक याद रुक रुक कर दोहराती है जिन्दगी पहले तो ढूंढती है अपने यह लिये खुद इक मुकाम और फ़िर खुद ही इक तलाश बन जाती है जिन्दगी ********************************************* कांच से रिश्ते संभालने में बिताई... [पूरी पोस्ट]
writer मोहिन्दर कुमार
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[08 Apr 2010 03:43 AM]

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