सुकून-ए-जिगर को शरारा न कर ले
सुकून-ए-जिगर को शरारा न कर लेकहीं दिल मुहब्बत गवारा न कर ले यह माना हिजाबों में रहते हो लेकिन हरममें ही कोई नज़ारा न कर लेन यूँ छेडकर आग दिलमें लगाओयह आँधी कहीं रुख तुम्हारा न कर लेकई साल के बाद रूठे हैं फिरसेकहीं इश्क़ हमसे दुबारा न कर लेकिसी दिन तो,...
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मिलिंद / Milind
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[07 Apr 2010 05:47 AM]



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