माँ के आंसुओं से लिखी ये इबारत ……
माँ, मेरी माँ,जिसके आंसुओं से लिखी है इबारत मैंने
गुब्बारे सा फूटा था गुबार ,
रोती रही थी अनवरत
धीरे-धीरे ….जी हल्का हुआ
सिसकियों के बीच
डबडबाते आंसुओं और थरथराते अधरों से
बही थी वेदना….
ढाढस ने तोड़ा था बाँध ,
बौनी हो गई थी संवेदना
परम्पराओं...
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satyanshu
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[07 Apr 2010 04:59 AM]



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