रसविहीन
कोई देखे तो
झगडना
मां-बेटे का
उन मुद्दों पर
जो कभी थे नहीं
परिवारों में
जब से
पनपने लगी है
सोच
समानता की
स्वतंत्रता की
स्त्री
दूर होती गई
अपनी भूमिका से
चूल्हा-चौका
अब नहीं काम
उसका
नौकर बनाने लगा
खाना
भावहीन-नीरस
कैसे संतुष्ट हो
बालक
रोज झगडता है
अच्छे...
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gulabkothari
poemगुलाब कोठारीgulab kothariरसविहीन
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[07 Apr 2010 03:43 AM]



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