रसविहीन

Gulabkothari's Blog कोई देखे तो झगडना मां-बेटे का उन मुद्दों पर जो कभी थे नहीं परिवारों में जब से पनपने लगी है सोच समानता की स्वतंत्रता की स्त्री दूर होती गई अपनी भूमिका से चूल्हा-चौका अब नहीं काम उसका नौकर बनाने लगा खाना भावहीन-नीरस कैसे संतुष्ट हो बालक रोज झगडता है अच्छे... [पूरी पोस्ट]
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poemगुलाब कोठारीgulab kothariरसविहीन

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[07 Apr 2010 03:43 AM]

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