जेठ और बैसाख की ये दोपहर
जेठ और बैसाख की ये दोपहर,तुमको अपने साथ अब भी खींच लाती है।सामने अंबर तले धरती जले,और हम तुम शांत थे महुआ तले।प्रेम की शीतल छवि वह याद करये धरा अब भी स्वयं का जी जलाती है।लू हुई थी साँझ की मलयज पवन,ताप यूँ पावन कि ज्यों दहका हवन,पांव जलते, ले प्रतीक्षा...
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कंचन सिंह चौहान
गीत
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[07 Apr 2010 02:23 AM]



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