एक वीरान घर...

क्या करूँ मुझे लिखना नहीं आता... गली के इस मोड़ से तीसरा घर,खड़ा है आज बिल्कुल वीरान सा,इसकी पौने तीन दीवारें भी लगती हैं,जैसे कर रही हो किसी पे ऐहसान सा,दीवारों के फीके रंग, और उनमें कई दरारें,खिड़कियाँ भी आधी खुली सी हैं,जैसे आज भी कोई किसी का रास्ता निहारें,छत भी एक बार ऐसी टूटी की... [पूरी पोस्ट]
writer Gurnam Singh Sodhi
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[07 Apr 2010 02:01 AM]

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