पंचाती

एक नई शुरुआत हाम सीधे मूंह थारे तै नी कह सकदे के आपनी ज़मीन बेच खोच कै भाजोइसपे  हाम  कब्ज़ा करना चाहवां  सां अक हामानै  फलाने रोलै की रडक क्युकरे काढणी सैअक थाम हामनै फूटी आँख नि सुहान्दे पाछे सी जिस छोरे की बरात मेंहामनै ले गे थे उस... [पूरी पोस्ट]
writer jagdeep singh

कविता

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[07 Apr 2010 00:39 AM]

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