भर्तृहरि नीति शतक-जागरुक लोग अपनी बेइज्जती नहीं सहते
सवल्पस्नायुवशेषमलिनं निर्मासमप्यस्थिगोः श्वा लब्ध्वा परितोषमेति न तु तत्तस्य क्षुधाशान्तये।सिंहो जम्बुकंकमागतमपि त्यकत्वा निहन्ति द्विपं सर्वः कृच्छ्रगतोऽप वांछति जनः सत्तवानुरूपं फलम्।।हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह कुत्ता थोड़े रस और चरबी वाली हड्डी पाकर...
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दीपक भारतदीप
समाज
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[06 Apr 2010 23:48 PM]



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