संवेदनाये मर चुकी है

कुछ कहानियाँ,कुछ नज्में संवेदनाये  मर चुकी है लाशें जवानो पड़ी है फुर्सत कहाँ हमको सान्या- शोइब से आगे सोचे भावनाए बिक चुकी है जो बुद्धू बक्सा दिखाए उसे सच मानते है हैदराबाद के दंगे का कारण कितने जानते है सोच कुंद हो चुकी हैजब तक हमारे मुह पर चांटा नहीं पड़ेगा दर्द नहीं... [पूरी पोस्ट]
writer Sonal Rastogi

नक्सल हमला

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[06 Apr 2010 22:58 PM]

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