अपनी आस्था का मंडन ही किसी प्रकार कल्याणकारी कैसे हो सकता है
यस्यप्रणम्य चरणौवरदस्यभक्त्या स्तुत्वाचवाग्भिरमलाभिरतंद्रिताभि:।दीप्तैस्तमासिनुदतेस्वकरैर्विवस्वांतंशंकरं शरणदं शरणं व्रजामि॥ जिन वरदायक भगवान के चरणों में भक्तिपूर्वकप्रणाम करने तथा आलस्य रहित निर्मल वाणी द्वारा जिनकी स्तुति करके सूर्य देव अपनी उद्दीप्त...
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Amit Sharma
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[25 Mar 2010 08:51 AM]



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